आरबीआई और सरकार में समझौता!

(सुशांत कुमार)
भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के बीच सुलह हो गई दिखती है। 19 नवंबर की आरबीआई बोर्ड की बैठक से पहले ऐसा लग रहा था कि सरकार और आरबीआई के बीच जबरदस्त विवाद होगा। यहां तक कहा जा रहा था कि अगर आरबीआई के गवर्नर और उनके डिप्टी गवर्नरों ने सरकार की बात नहीं मानी तो सरकार आरबीआई कानून की धारा सात का इस्तेमाल करेगी। अगर सरकार ऐसा करती तो गवर्नर उर्जित पटेल और डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य इस्तीफा दे सकते थे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
ऐसा कुछ नहीं हो और टकराव ज्यादा नहीं बढ़े यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ दिन पहले ही उर्जित पटेल ने दिल्ली आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाकात कर ली थी। उसके बाद ऐसे संकेत मिलने लगे थे कि दोनों बीच का रास्ता निकालने पर सहमत हो गए हैं। सो,19 नवंबर को हुई बोर्ड की बैठक में बीच का रास्ता निकाल लिया गया। रिजर्व बैंक छोटे व लघु उद्यमों के लिए कर्ज की उपलब्धता बढ़ाने पर सहमत हो गया तो साथ ही केंद्रीय बैंक के कैपिटल फ्रेमवर्क यानी पूंजी ढांचे पर विचार की भी सहमति बन गई।
इसके लिए एक कमेटी बनाने का फैसला हुआ, जिसकी सिफारिशों के आधार पर सरकार और बोर्ड आगे बढ़ेंगे। बोर्ड की बैठक के बाद तत्काल यह कहा जा रहा है कि कारोबारी बैंकों को करीब 14 हजार करोड़ रुपए उपलब्ध होंगे। यानी उनके लिए कर्ज बांटना आसान होगा। सरकार की असली चिंता यहीं थी कि चुनाव से पांच महीने पहले अगर लोगों को कर्ज मिलने बंद हो गए तो क्या होगा? आरबीआई ने यह चिंता दूर कर दी है।
केंद्र सरकार बार बार कहती है कि देश की आर्थिकी का बुनियादी ढांचा बहुत मजबूत है। पर आरबीआई के विवाद से यह जाहिर हुआ है कि असल में ऐसा नहीं है।
अगर बुनियादी ढांचा मजबूत होता तो चुनाव से पांच महीने पहले सरकार को इस बात के लिए दबाव नहीं बनाना होता कि रिजर्व बैंक अपना आरक्षित कोष कम करे। पहले तो यह खबर थी कि सरकार सीधे रिजर्व बैंक के आरक्षित कोष में से तीन लाख 60 हजार करोड़ रुपए लेना चाहती है ताकि उसे कथित विकास के काम में लगाया जा सके। जब इस पर विवाद हुआ तो पूंजी ढांचा बदलने की बात आई। अगर सरकार को रिजर्व बैंक का पूंजी ढांचा बदलना था तो यह शुरू में ही किया जाना था।
सरकार के कार्यकाल के बिल्कुल आखिर में आकर ऐसा किया जा रहा है, इससे ही सरकार की मंशा पर सवाल उठे हैं। गौरतलब है कि अभी रिजर्व बैंक का आरक्षित कोष 27-28 फीसदी है और केंद्र सरकार चाहती है कि इसे 15-16 फीसदी या उससे भी कम पर लाया जाए। आरक्षित कोष कितना हो इस बारे में फैसला कमेटी की सिफारिशों के बाद होगा। पर इतना तय है कि इसे घटाया जाएगा। अगर एक तिहाई की कमी की जाती है तो रिजर्व बैंक के नौ लाख 60 हजार करोड़ रुपए के आरक्षित कोष में से सरकार को तीन लाख 20 हजार करोड़ रुपए मिल जाएंगे।
असल में रिजर्व बैंक और भारत सरकार का रिश्ता हमेशा तनाव वाला रहा है। पर पहले माना जाता था कि रिजर्व बैंक का काम महंगाई को काबू में रखना और मुद्रा को स्थिर रखना है। इतना सीमित काम होने की वजह से सरकार के साथ कम टकराव होता था। सिर्फ नीतिगत ब्याज दरों को लेकर खींचतान होती थी। मुद्रा को स्थिर रखने और महंगाई को काबू में रखने के लिए बैंक नीतिगत ब्याज दरों पर अपनी पकड़ रखती थी और सरकार चाहती थी कि बैंक इसे कम करे ताकि विकास की गतिविधियों में तेजी आई। पर अब केंद्रीय बैंक की भूमिका बदल रही है और बड़ी भी हो रही है। उसे सिर्फ मुद्रा औऱ महंगाई के बारे में नहीं सोचना है, बल्कि व्यापक अर्थों में देश की अर्थव्यवस्था के बारे में सोचना है। दुनिया के कई देशों के केंद्रीय बैंक ने अपनी भूमिका बढ़ाई है। तभी टकराव के मुद्दे भी बढ़े हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी मुद्रा और महंगाई से आगे बढ़ कर देश की अर्थव्यवस्था की सेहत, बाजार की स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय साख आदि के बारे में विचार किया और आरक्षित अनुपात कम करने के प्रयास पर आपत्ति की। पर अब वह लिए तैयार हो गई है क्योंकि सरकार का एकमात्र फोकस इस पर है कि वह कैसे विकास होता हुआ दिखाए। यह तभी संभव है, जब बाजार में नकदी उपलब्ध हो।
यूपीए सरकार के समय महंगाई काबू में रखने के लिए करीब डेढ़ दर्जन बार नीतिगत ब्याज दरों में बढ़ोतरी हुई हुई थी। इसका असर बाद के सालों में विकास दर पर पड़ा था। आरबीआई का पैसा लेने के लिए यूपीए की सरकार ने ही यह पूरा लाभांश ले लेने का नियम बनाया था। पर केंद्र की मौजूदा सरकार इससे भी आगे बढ़ गई है।
वह आरक्षित अनुपात कम करा रही है और तमाम एनपीए के बावजूद कर्ज देने की प्रक्रिया को आसान रखने पर जोर दे रही है ताकि विकास दर कम नहीं होने पाए। हैरानी की बात यह है कि पेट्रोल, डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ा कर, विनिवेश के जरिए, आय कर की वसूली बढ़ा कर, जीएसटी के जरिए सरकार इतना राजस्व वसूली का ढिंढोरा पीट रही है और इसके बावजूद उसकी नजर आरबीआई के पैसे पर है! इससे ऐसा लग रहा है कि अर्थव्यवस्था में किसी न किसी स्तर पर कुछ बड़ी गड़बड़ी है, जिसे सरकार बता नहीं रही है।
(साई फीचर्स)

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