रोबॉट पढ़ते न्यूज, एडिटर बन रही मशीन

(किंशुक पाठक)

हाल तक मान्यता रही है कि संपादन या लेखन जैसे काम तकनीक नहीं कर सकती क्योंकि ये सृजनात्मक कार्य हैं और सृजन का गुण तो केवल मनुष्य के पास है। एक कहावत भी प्रचलित रही है- आर्टिफिशल इंटेलिजेंस कैन नॉट रिप्लेस क्रिएटिविटी (कृत्रिम बुद्धि रचनात्मकता की जगह नहीं ले सकती)। लेकिन यह धारणा अब गलत साबित हो रही है। पत्रकारिता के क्षेत्र में रोबॉट का आगमन हो चुका है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के विकास ने एडिटर और रिपोर्टर के बगैर जर्नलिज़म की कल्पना को साकार करना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों चीन ने दुनिया में पहली बार दो रोबॉट न्यूज ऐंकर पेश कर सबको हतप्रभ कर दिया है। वहां की सरकारी न्यूज एजेंसी शिनह्वा ने इसके लिए चीन की सर्च इंचन कंपनी सोगोऊ के साथ साझेदारी की है। ये आर्टिफिशल न्यूज एंकर है बड़े आराम से खबरें पढ़ते हैं। इनकी आवाज बिल्कुल इंसानों जैसी है। शिनह्वा ने दावा किया कि कंप्यूटरीकृत दिमाग से चलने वाले ये दुनिया के पहले एआई न्यूज एंकर हैं।

रोबॉट एंकरों में से एक इंग्लिश और दूसरा चीनी भाषा में न्यूज पढ़ता है। शिनह्वा के अनुसार ये रोबॉट्स उसकी रिपोर्टिंग टीम का हिस्सा बन चुके हैं और ये अन्य एंकर्स की तरह ही काम करेंगे। इन्हें एंकर्स की आवाज और फेस एक्सप्रेशन जैसे गुण सिखाए गए हैं। खासतौर से ब्रेकिंग न्यूज समय से देने के लिए इन्हें तैयार किया गया है। समाचार एजेंसी के अधिकारियों की मान्यता है कि इन न्यूज रीडरों की सेवाएं लेने के कारण उनकी प्रॉड्क्शन लागत कम हुई है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की सरल परिभाषा होगी, इंसानी बुद्धि का काम मशीनी बुद्धि के जरिये संपन्न करना। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से मशीनों में इंसानों वाली समझ विकसित हो रही है। पिछले कुछ सालों में कई कंपनियों, खासकर गूगल और माइक्रोसॉफ्ट ने आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में कई काम शुरू किए हैं। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस से लगभग हर दायरे में कंप्यूटिंग पावर को बढ़ाया जा रहा है।

गौरतलब है कि प्रिंट मीडिया के विकास के बाद जब रेडियो आया तो उस समय रेडियो को न्यू मीडिया का नाम मिला। 60-70 के दशक में मानव रहित अनमैन्ड रेडियो स्टेशन पूरी दुनिया में प्रचलन में आए लेकिन प्रिंट मीडिया पर तकनीक का व्यापक प्रभाव 21वीं सदी के हाल के वर्षों में ही दिखाई पड़ा है। तकनीक ने पत्रकारिता के बुनियादी स्वरूप को ही बदलना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों ने ऐसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर विकसित किए हैं जिनके जरिए तथ्यों और सूचनाओं को समाचार में परिवर्तित किया जा रहा है। इसमें पत्रकारिता के मानवीय कौशल की बहुत आवश्यकता नहीं है। कई रिपोर्टें ऐसी होती हैं जिनके लिए अधिक विश्लेषण की जरूरत नहीं होती। खेल और चुनाव के आंकड़ों को ये सॉफ्टवेयर आसानी से खबर की शक्ल दे देते हैं। अमेरिका में स्वचालित पत्रकारिता (ऑटोमेटेड जर्नलिज्म) की परिकल्पना पहले से ही चर्चा में है और अब यह व्यावहारिक स्तर पर आजमाई जा रही है। इससे संबंधित मीडिया में प्रकाशन-प्रसारण सामग्री की लागत कम हुई है और समाचारों की संख्या बढ़ी है। आज का मीडिया प्रबंधन इसे अपने लिए मुफीद मान रहा है क्योंकि इससे समय की बचत होती है और मानवीय भूलों से छुटकारा भी मिल जाता है।

तर्क दिया जा रहा है कि समाचार  चेनलों के एंकर अपने संस्थानों से भारी वेतन उठाते हैं लेकिन इसके बदले में उनसे हफ्ते के सातों दिन और हर दिन के चौबीसों घंटे काम नहीं करवाया जा सकता। शारीरिक-मानसिक सीमाओं के अलावा व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े नियम-कानून भी इसकी इजाजत नहीं देते। लेकिन एआई एंकरों के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं रहेगी। उनसे अपनी इच्छा के मुताबिक काम करवाए जा सकते हैं। चीन में इन एंकरों से चौबीसों घंटे बुलेटिन पढ़वाए जाएंगे। ये इंसान नहीं हैं तो जाहिर है कि ये न तो ये थकेंगे और न ही लगातार काम करवाए जाने पर आपत्ति या विरोध दर्ज कराएंगे। ऐसे में यह आशंका निराधार नहीं है कि ये नकली एंकर भविष्य में असली एंकरों के लिए वास्तविक खतरा बन सकते हैं।

वैसे कई लोग एआई जर्नलिज्म पर सवाल भी उठा रहे हैं। ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस के प्रफेसर माइकल वल्डरीड्ज का मानना है कि चीन में विकसित रोबॉट न्यूज एंकर के कार्यों और प्रस्तुति में स्वाभाविकता नहीं है। कुछ ही मिनटों की प्रस्तुति के बाद शायद ही लोग इन्हें देखना पसंद करते हों। प्रफेसर माइकल की तरह ही पूरे विश्व के तमाम प्रतिष्ठित मीडिया संगठनों में इस तकनीकी के आलोचक भी कम नहीं हैं। उनका मानना है कि इसका भविष्य और कार्यक्षेत्र बहुत सीमित है। बहुत से कार्यों में यह उपयोगी नहीं है। गम्भीर विश्लेषण और विवेचना, खोजी पत्रकारिता तथा साक्षात्कार में यह कतई कारगर सिद्ध नहीं हो सकेगा। लेकिन शिनह्वा के संचालकों का मानना है कि अभी एआई समाचार एंकर की संकल्पना से जुड़े शोध ही पूरे नहीं हुए हैं। इनके पूरे होने के बाद ही इस तकनीकी की संपूर्ण क्षमता उद्घाटित हो सकेगी।

कई लोग इसे समाज और व्यवस्था से जोड़कर कुछ गंभीर सवाल भी खड़े कर रहे हैं। उनका कहना है कि पत्रकारिता में एआई तकनीक को एक सीमा से ज्यादा बढ़ावा देना कई दृष्टियों से खतरनाक है। उनके मुताबिक यह न सिर्फ असली पत्रकारों और जनता के बीच के रिश्ते को खत्म करने का काम करेगी, बल्कि आगे चलकर यह लोकतंत्र को कमजोर करने का जरिया भी बन सकती है। चीन के संदर्भ में यह आशंका और बढ़ जाती है, जहां राष्ट्रपति शी चिनफिंग के नेतृत्व में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पहले से ही कमजोर दिख रही है। बहरहाल, नई तकनीकों का विरोध शुरू में होता ही रहा है, लेकिन फिर लोग इनके साथ रहना सीख लेते हैं। संभव है, यह बात मीडिया में आ रही एआई तकनीक पर भी लागू हो।

(साई फीचर्स)

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