बिना मकसद का विद्रोह

 

(चंद्रभूषण)

विद्रोह हमारे दौर का एक सुंदर शब्द है लेकिन अपने इर्द-गिर्द विद्रोहियों की शिनाख्त करने निकलें तो शायद ही कुछ हाथ लगे। नौवीं क्लास के मेरे दो दोस्त एक दिन आपस में लड़ पड़े तो घरेलू मामलों को लेकर परेशान चल रहे रामकेर माट्साब ने दोनों को दम भर थूरने का फैसला किया। दोनों में ज्यादा मजबूत दिखने वाला दोस्त अड़तीसवां डंडा पड़ने के बाद रोने-गिड़गिड़ाने लगा और चालीसवें से पहले ही माट्साब के पैरों से लिपट गया। वहीं, नरम दिखने वाले दूसरे दोस्त ने बिल्कुल सपाट चेहरे के साथ बावन डंडे एक के बाद दूसरी हथेली आगे करते हुए झेले और माट्साब ने अंततः हाथ थक जाने की वजह से उसे उसके हाल पर छोड़ दिया।

इससे मेरे दिमाग में उसकी विद्रोही छवि बनी। लगा कि वह जीवन में कुछ ऐसा करेगा जो किसी ने न किया हो लेकिन इस घटना के बीस साल बाद वह मिला तो जिला कचहरी में वकालत कर रहा था जहां उसकी आमदनी का मुख्य जरिया डकैतों की जमानत कराने का था। उसने बताया कि इसके लिए वकालत आना जरूरी नहीं है। जज साहेबान से दूर-दराज का कोई रिश्ता निकाल लेना और न निकले तो उनके घर दूध, फल, सब्जी पहुंचाने का कोई बहाना खोज लेना काफी है। इस लीचड़पने के बावजूद इतना विद्रोह उसके अंदर बचा था कि सिस्टम का महिमामंडन उसके स्वभाव का हिस्सा तब भी नहीं था। वह इसके आर-पार देखता था और मजे लेता था।

पिछले दिनों मेरे एक युवा मित्र ने एक बहुचर्चित रैपर का पहला ऐल्बवम दिखाया जिसका नाम स्त्री जननांग के लिए आने वाले एक सड़कछाप शब्द पर था। इसके ट्रैक्स में गालियां भरी थीं और इन्हें बलात्कार का विशद शब्द-चित्र कहा जा सकता था। यह रैपर नई पीढ़ी में जबरदस्ते हिट हुआ। फिल्मी दुनिया ने भी उसका सदुपयोग किया। फिर ड्रग एडिक्शन ने उसे लपेटे में ले लिया और उसके फैन फिलहाल उसकी दूसरी पारी शुरू होने की बाट जोह रहे हैं। ऐसा रिबेल विदाउट कॉज हमारी युगीन परिघटना है। बेबाक कुछ ऐसा बोलना जिसे बोलने में औरों की जुबान फंसती हो। बात में थोड़ा चुरमुरापन भी हो तो ऐसे विद्रोही बाजार के लिए हॉटकेक बन जाते हैं।

जिस विद्रोह का कोई मकसद हो, जो विद्रोही साहित्य, कला, राजनीति या जिंदगी के किसी अन्य पहलू का पिटा-पिटाया रास्ता छोड़ इसका कोई नया मिजाज, नया व्याकरण गढ़ना चाहते हों, अस्सी और नब्बे के दशकों में उन्हें झोलावाला बताकर चलन से बाहर कर दिया गया। सत्ताधारी वर्गों ने सतत प्रयास के जरिए उन्हें लकीर का फकीर साबित किया। उनकी रूमानियत उनसे छीन ली और अंधा करके उन्हें स्वर्ग की सीढ़ियों से नीचे धकेल दिया। इतने सबके बाद विद्रोह के नाम पर वह चरपरी चीज ही बचनी थी जिसे स्वाद बदलने के लिए आप भी खा सकते हैं।

(साई फीचर्स)

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