बाजार की गोद में चाचा के बच्चे

(उपमा सिंह)

सैफ अली खान और करीना कपूर खान के साहबजादे तैमूर अली खान अब एक खिलौना बन चुके हैं। केरल में उनके नाम और शक्ल-ओ-सूरत वाला गुड्डा बिक रहा है, जिसे खूब पसंद भी किया जा रहा है। बाकी, उनकी तस्वीरें तो पैदाइश के साथ से ही बिकने लगी थीं। अब पता चला है कि उनका बाकयदा एक रेटकार्ड है और जल्द ही दो साल के होने जा रहे तैमूर की तस्वीरें उस रेटकार्ड में सबसे ऊपर हैं। अपने घर और प्ले-स्कूल के बाहर हर वक्त कैमरे का शटर दबाए पपराजी को मासूमियत से हाय और बाय कहने वाले तैमूर को यह अंदाजा भी नहीं कि असल में यह प्यार उनके लिए नहीं, पैसों के लिए है। इन पपराजीज के लिए वह एक प्रॉडक्ट हैं, जिनकी तस्वीरें बेचकर वे मोटी आमदनी कर सकते हैं।

इस लिस्ट में ऐश्वर्या और अभिषेक की बेटी आराध्या, सोहा अली खान और कुणाल खेमू की बेटी इनाया, तुषार कपूर के बेटे लक्ष्य जैसे कुछ और स्टारकिड्स भी शामिल हैं। लेकिन तैमूर इन सबमें कहीं ऊपर हैं। कहा जाता है कि उनकी एक-एक तस्वीर डेढ़ से दो हजार में बिकती है। इसी वजह से वह हर पल कैमरों के घेरे में रहते हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि अब कुछ ऐक्टर्स खुद ही अपने बच्चों की तस्वीरें बेचने लगे हैं। कुल मिलाकर स्टार किड्स के लिए पागल इस पपराजी कल्चर ने एक नई बहस छेड़ दी है। अभी कुछ दिनों पहले ही बाल दिवस यानी बच्चों के चाचा नेहरू का जन्मदिन बीता है। वही चाचा नेहरू, जो बच्चों को देश का भविष्य और बचपन को फूलों सा कोमल मानते थे। लेकिन बाजार की जद में तमाम बच्चों का बचपन पूरी तरह खिलने से पहले ही मुरझाने लगा है। स्टार किड्स ही नहीं, विज्ञापनों में तेल, साबुन से लेकर जीवन बीमा पॉलिसी और म्यूचुअल फंड तक बेचते बच्चे, रिऐलिटी शोज में हार-जीत की तराजू में बैठ अपने हुनर की नुमाइश करते बच्चे, टीवी शोज में रोजाना टेलिकास्ट के प्रेशर में 12-12 घंटे काम करने वाले मेकअप में लिपे-पुते बच्चे, इन सभी को लेकर बहस लगातार चलती रहती है, लेकिन समाधान कुछ नहीं निकलता।

हाल ही एक फिल्म आई है पीहू, जिसकी इकलौती कलाकार एक दो साल की बच्ची है। 92 मिनट की यह पूरी फिल्म सिर्फ उसी बच्ची के इर्द-गिर्द है, जो नल से लगातार बहते पानी, प्रेस से निकलते धुएं, किचन में जलते गैस बर्नर के खतरों के बीच घूमती रहती है। कभी फ्रिज में बंद हो जाती है, तो कभी बालकनी की रेलिंग पर चढ़ जाती है। इस फिल्म के अनूठे कॉन्सेप्ट की एक ओर काफी तारीफ हुई, तो दूसरी ओर यह सवाल भी उठा कि अपनी क्रिएटिविटी के लिए इतनी छोटी बच्ची को इतने सारे खतरों के डालना कहां तक वाजिब है? फिल्मों और धारावाहिकों में छोटे-छोटे बच्चों को ऐसी-ऐसी सिचुएशंस, जिसके बारे में उन्हें पता भी नहीं, में डालने को लेकर भी बहस होती रही है। मसलन, कुछ वक्त पहले एक वेब-सीरीज आई थी, सेक्स चौट विद पप्पू ऐंड पापा, जिसमें छह साल के बाल कलाकार कबीर शेख कॉन्डम और होमो-सेक्शुएलिटी जैसे विषयों पर सवाल-जवाब करते हैं। बाल-विवाह, शोषण आदि के ट्रॉमा वाले सीन्स में बच्चों को शामिल करने पर भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में, लोगों और खास तौर पर मायानगरी वालों को थोड़ा संवेदनशील होने की जरूरत है और एक बैलेंस बनाने की जरूरत है, ताकि इन मासूम बच्चों का फूल सरीखा बचपन पूरी तरह अच्छे से खिल पाए।

(साई फीचर्स)

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