पृथ्वी के पांचवें चट्टानी सहोदर के बारे में

(चंद्रभूषण)

अब से कोई 10 साल पहले अक्टूबर 2008 में सूडान के नूबिया रेगिस्तान में बिखरे एक उल्कापिंड ने सौरमंडल से जुड़े कुछ बुनियादी सवालों में नई दिलचस्पी जगा दी है। यूरीलाइट किस्म के इस उल्कापिंड की एक खासियत यह है कि इस मिजाज के तीन ही नमूने अभी तक धरती पर खोजे जा सके हैं। पहला रूस के मोर्दाेविया प्रांत के नोवी यूरी गांव में, दूसरा हमारे यहां असम के ग्वालपाड़ा जिले में और तीसरा यह जिसका यहां जिक्र हो रहा है। यूरीलाइट उल्कापिंडों की दो विशेषताएं मानी जाती हैं। एक इनमें अमीनो एसिड जैसे जटिल कार्बनिक पदार्थ पाए जाते हैं और दूसरा, इनमें सूक्ष्म आकार के हीरे भी मिलते हैं। इनके कुल वजन का 3 प्रतिशत हिस्सा कार्बन का ही होता है जो इनमें ग्रेफाइट और हीरे के रूप में मौजूद होता है।

जिस उल्कापिंड की हम यहां बात कर रहे हैं, वह 2008 टीसी-3 यूरीलाइट है और उसमें सूक्ष्म हीरे मौजूद हैं। यह तो एक बात है लेकिन इससे बड़ा मामला इसमें मौजूद हीरों के आकार-प्रकार का है। एक तो यह कि पानी का इनमें कोई लेश नहीं है, दूसरे इनके क्रिस्टल्सए का आकार अन्य उल्कापिंडों में पाए जाने वाले हीरों से लगभग एक लाख गुना बड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं कि ये हीरे गहनों में लगाए जा सकते हैं। इनका आकार एक मिलीमीटर के दसवें हिस्से जितना ही है। दरअसल, कार्बन की मौजूदगी वाले अन्य उल्कापिंडों में जो हीरे पाए जाते हैं, उनका आकार एक मिलीमीटर के दस लाखवें हिस्से के बराबर होता है। लिहाजा, उनकी तुलना में 2008 टीसी-3 के हीरे बहुत बड़े ही कहे जाएंगे।

इतने बड़े हीरे इस उल्कापिंड को खासमखास बनाने के लिए पर्याप्त हैं। दरअसल, कार्बन की मौजूदगी वाले अंतरिघ्क्षीय पिंडों में हीरों के अति-सूक्ष्म क्रिस्टल्सर का निर्माण सौरमंडल के निर्माण के क्रम में छोटे पिंडों के एक-दूसरे से टकराने के दौरान अचानक बने उच्च तापमान और दबाव की स्थितियों से हुआ माना जाता है। हालांकि, 2008 टीसी-3 में पाए गए हीरे लंबे समय तक कायम दबाव से ही बन सकते हैं, अचानक हुई टक्कर से इनका बनना असंभव है। इससे एक बात तो यह पता चलती है कि ये किसी ग्रह के भीतरी हिस्से में बने हैं। मजे की बात यह है कि वैज्ञानिक इस ग्रह के आकार का हिसाब लगाने में भी सफल रहे और पाया कि यह बुध से बड़ा लेकिन मंगल से छोटा रहा होगा।

उल्कापिंडों के अभी तक किए गए अध्ययन से एक बात तय पाई गई है कि सौरमंडल के निर्माण के पहले एक करोड़ वर्षों में इसका भीतरी हिस्सा यानी वह जहां अभी चारों ठोस चट्टानी ग्रह मंगल, पृथ्वी, शुक्र और बुध पाए जाते हैं, भयानक टकरावों का नमूना बना हुआ था। एक अनुमान के मुताबिक, बहुत सारे प्रारंभिक ग्रहों (प्रोटो-प्लैनेट्स) के आपसी टकराव से हुए द्रव्य के पुनर्वितरण के बाद सौरमंडल के चारों भीतरी ग्रहों का निर्माण हुआ था। इनमें एक चंद्रमा को भी गिना जा सकता है जो कोई ग्रह नहीं बल्कि एक उपग्रह है लेकिन कई मामलों में यह सौरमंडल के बाकी उपग्रहों से बिल्कुल अलग भी है। जैसे एक तो इस मायने में कि इसका निर्माण पृथ्वी बनने के कोई तीस लाख साल बाद इसके साथ किसी और ग्रह के टकराने से हुआ बताया जाता है।

तो क्या 2008 टीसी-3 उसी टकराव के दौरान छिन्न-भिन्न हुए उस ग्रह का ही कोई भीतरी टुकड़ा है जो साढ़े चार अरब साल आसमान में यूं ही भटकने के बाद आखिरकार धरती पर आ पड़ा? इस बारे में कोई जानकारी हमें इस उल्कापिंड की और ज्यादा सूक्ष्म जांच के बाद मिल सकेगी। आसमान में 80 टन वजन वाली 13 फीट मोटी चट्टान के रूप में घूमता हुआ, धरती पर आते-आते सिर्फ साढ़े दस किलो रह गया यह पत्थर किसी ग्रह के भीतरी हिस्से में बना था, इतना तय है। अब वहां कितने समय तक रहने के बाद यह ग्रह से अलग हुआ, यह अगर किसी तरह पता चल सके तो हम जान सकेंगे कि सौरमंडल के भीतरी हिस्से में इसकी उम्र के पहले एक करोड़ वर्षों के बाद से चार ही ग्रह घूम रहे हैं या इनके अलावा कोई पांचवां ग्रह भी यहां कभी किसी स्थिर कक्षा में घूमता था।

यह दूसरी वाली धारणा मंगल और बृहस्पति के बीच क्षुद्र ग्रहों वाले विशाल क्षेत्र में कभी बाकायदा एक ग्रह मौजूद होने और सौरमंडल के बाहर से आए किसी पिंड की टक्कर में इसके तहस-नहस हो जाने की संकल्पना से जुड़ी है। इसको अभी तक अंतिम रूप से पुष्ट या खारिज नहीं किया जा सका है। उम्मीद करें कि 2008 टीसी-3 से उपजी यह नई दिलचस्पी सौरमंडल को लेकर हमारी जानकारी और समझ को नई ऊंचाई पर ले जाएगी।

(साई फीचर्स)

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