तब मोदी कैसे जीतेंगे बनारस में?

(हरि शंकर व्यास)

सवाल गोऱखपुर से उठा है। जहां 29 साल बाद भाजपा हारी है! हां, जान लें कि देश की हिंदू राजनीति की पहली और अकेली प्रयोगशाला का नाम है गोरखपुर। उत्तर भारत याकि यूपी की राजनीति में हिंदू राजनीति का केंद्र बिंदु न अयोध्या-फैजाबाद रहा है और न बनारस। यदि कोई रहा है तो वह गोरखपुर। जहां नेहरू के वक्त हिदू महासभा का परचम लहराता था तो प्रकारांतर में संविद सरकार से ले कर योगी आदित्यनाथ की हिंदूवाहिनी तक की वह प्रयोगशाला रहा। उसी प्रयोगशाला से प्रकट हुए भगवा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। एक और तथ्य जानंे। गोरखपुर वह केंद्र है जहां से पूर्वी यूपी में राजपूत बनाम ब्राह्यण के दबदबे का ज्वार भाटा उठता या बैठता है। सो गोरखपुर का मूड बनारस के पंडितों, ब्राह्यणों का मूड लिए होता है, उसे दिशा देता है। इस हकीकत में ही नरेंद्र मोदी के लिए गोरखपुर का फैसला नंबर एक खतरे की घंटी है।

जैसा मैंने कल लिखा, गोरखपुर, फूलपुर में भाजपा इसलिए हारी क्योंकि जहां सपा-बसपा में तालमेल था वही योगी के गंवार ठाकुर राज ने ब्राह्यणों को घर बैठने के लिए मजबूर किया है। सो अपना मानना है कि यदि ये दो बाते मई 2019 के आम चुनाव तक जस की तस बनी रहती हैं, योगी को भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाए रखती है और सपा-बसपा-कांग्रेस में सचमुच तालमेल बनता है तो नरेंद्र मोदी को लेने के देने पडेंगे!

संदेह नहीं कि बनारस की सीट भाजपा की उन आठ-दस सीटों (गोरखपुर, कानपुर, लखनऊ, नोएडा, मेरठ) जैसी है जो सपा-बसपा के साझे की आंधी के बावजूद जीती जाती रही है। मैं यूपी और बिहार को अभी भी भाजपा का मजबूत गढ़ मानता हूं क्योंकि दोनों राज्यों में हिंदूस्तान बनाम पाकिस्तान हो सकना संभव है तो दूसरी तरफ मायावती के अब तक के रिकार्ड व व्यवहार से यह भी समझ सकते हैं कि उन्हे हैंडल कर सकना अखिलेश या राहुल गांधी के लिए असंभव सी बात है। बावजूद इसके चुनाव नतीजे में साझे का योगदान तथ्य है। नतीजों के बाद मायावती- अखिलेश की भाव-भंगिमा भी एलांयस के संकेत दे रही है।

सो सपा-बसपा के एलायंस के सिनेरियो और योगी के गंवई ठाकुर राज की हकीकत को यदि जोड़े तो बनारस का नंबर एक विचारणीय पहलू यह होगा कि तब ब्राह्यण को साझा विपक्षी उम्मीदवार की और जाने से कौन रोक सकता है? ब्राह्यण दृभूमिहार बनारस में निर्णायक है जबकि यही वर्ग अब मोदी-योगी राज में अपने को सर्वाधिक ठगा महसूस कर रहा है।

तभी वह न फूलपुर में भाजपा को वोट डालने घर से निकला और न गोरखपुर में। ब्राह्यण ने इस सीमा तक जा कर भाजपा से मुंह मोड़ा कि योगी ने ब्राह्यण उम्मीदवार के लिए प्रचार किया लेकिन उसने योगी को मजा चखाने के लिए या तो घर में रहना अच्छा समझा या सपा उम्मीदवार को वोट दिया या कांग्रेस के ब्राह्यण उम्मीदवार को बीस हजार वोट दे अपना वोट जाया किया।

संदेह नहीं है कि अखिलेश- मायावती और राहुल गांधी ने योगी राज में ब्राह्यणों की बन रही मनोदशा को समझा है। अखिलेश से रजामंदी के साथ कांग्रेस ने ब्राह्यण उम्मीदवार उतारे ताकि कुछ हजार ही सही ब्राह्यण वोट कांग्रेस को जाएं। जो टीकाकार कह रहे हैं कि कांग्रेस ने जमानत जप्त कराई और वह खत्म है वे कांग्रेस में बनी इस समझदारी को नहीं समझ रहे हैं कि उसे जैसे भी हो उन ब्राह्यण वोटों का विकल्प बनना है जो भाजपा से मोहभंग की दशा में अंतत : पलटी मारेंगे।

अपनी पुरानी थीसिस है और प्रमाणित थीसिस है कि यूपी में ब्राह्यण हवा बनाता या बिगड़वाता है। इस बात को जिसने समझा उसने सत्ता पाई। वीपीसिंह ने बनारस के पंडितों से यों ही राजऋषि का सम्मान नहीं लिया था या अटलबिहारी पंडित वाजपेयी बन कर यों ही लखनऊ जा चुनाव नहीं लड़े थे। ऐसे ही नरेंद्र मोदी ने पंडित मालवीय के प्रति दिखावा हिसाब लगा कर दिखाया था। नेहरू सेकुलर राजनीति के नारों के वक्त भी फूलपुर में अपने को पंडित नेहरू कहलाने वाले पोस्टर छपवा कर चुनाव लड़ते थे। ब्राह्यण ने मायावती की हवा बनाई तो मूड बदलने पर साईकिल की सवारी की। सचमुच वह इमरजेंसी के वक्त का संजय गांधी का बलंडर था जो उन्होने यूपी में ठाकुर नेताओं को उभारा या राजीव गांधी ने काशी के कमलापति त्रिपाठी के अपमान जैसी गलतियां कर कांग्रेस के नैसर्गिक ब्राह्यण-मुस्लिम-दलित समीकरण को छिन्न-भिन्न करने के बीज बोए। जिसका बाद में सर्वाधिक फायदा मंदिर आंदोलन के संयोग से भाजपा को मिला।

बहरहाल, मैं भटक गया हूं। मोटा तथ्य है कि अच्छे दिन के ख्वाब दिखा कर नरेंद्र मोदी ने बनारस के पंडितों का दिल जीत 2014 में सुनामी बनाई। पूरे यूपी को जीता। वही 2017 में विधानसभा चुनाव में भी हुआ। तभी सवाल है 2014 के तीन साल बाद 2017 में भी समर्थको का जस का तस जोश बना तो 2018 में वह क्यों नहीं?

एक जवाब सपा-बसपा का एलायंस है। इसके साथ योगी, मोदी, शाह सबने निश्चित सोचा होगा कि दोनों सीटों में ठाकुर या मोर्या के पिछड़े वोट पडे तो बाकि किस वोट की कमी रही? ऐसी कमी कि जिसके चलते मतदान भी कम हुआ तो भाजपा गोरखपुर में 29 साल पुरानी स्थिति में लौटी!

जाहिर है फैक्टर ब्राह्यण है। ब्राह्यण आज केंद्र सरकार और यूपी की योगी सरकार दोनों से ठगा महसूस कर रहा है। वह देख रहा है कि भाजपा ने ब्राह्यणों को घर की मुर्गी बना डाला है जबकि मोदी-शाह ने आधा दर्जन राजपूत मुख्यमंत्री बना डाले। मोदी बनारस आ कर आरती भले पंडित मालवीय की उतारें लेकिन गद्दी पर उन योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मोर्य को बैठाते हैं जो ब्राह्यण को उनके मुंह पर सुनाते हैं।

आप कह सकते हैं ये जातिवादी बाते हैं। लेकिन यूपी के एक्टीविस्ट किस्म के आम ब्राह्यणजन से बात करें सब कहते मिलेंगे कि मुख्यमंत्री योगी ने गोरखपुर-पूर्वांचल की जातिय राजनीति की बेकग्राउंड में राज को एक ऐसे गंवार ठाकुर राज में कनवर्ट डाला है जिसमें गर्वनेश के जी अक्षर की समझ भी नहीं है तो मकसद मानो ब्राह्यणों को औकात दिखलाना है। यूपी की जातिवादी राजनीति में जिले के डीएम-एसपी के पद पर कौन किस जात का है यह जातियों को इस बात का अहसास कराने वाली पहली बात है कि राज में उनकी कोई हैसियत है या नहीं? और योगी ने थोक में जैसे डीएम, एसपी ठाकुर बनाए है वे बाकि जातियों की तरह ब्राह्यणों को भी मैसेज है। लेकिन ब्राह्यण इसलिए ज्यादा बिदके है क्योंकि योगी की ठाकुर राजनीति से उनका पुराना पंगा रहा है। ब्राह्यण विधायकों के काम नहीं होने जैसी दस तरह की शिकायते हैं। जो ब्राह्यण मंत्री हैं उनके यहां सचिव नजर रखने वाले, अड़चन डालने वाले तैनात हैं। वैसे यह बात भाजपा के सभी सांसदों, विधायकों के लिए लागू है कि योगी राज में कोई प्रशासन से जनता का काम नहीं करा सकता लेकिन ब्राह्यण सांसद और विधायक तो मन से अब मान बैठे हैं कि योगी राज में उनकी सुनवाई नहीं है।

और फूलपुर के उपमुख्यमंत्री केशवप्रसाद मोर्य के तो और बढ़ कर किस्से हैं। वे ब्राह्यण नेताओं को उनके मुंह पर सुना देते हैं। उनके पीडब्ल्यूडी विभाग में कोई काम हुआ तो पहले ब्राह्यण ठेकेदार आउट होगा फिर काम आगे बढ़ेगा। सो मुख्यमंत्री हो या उपमुख्यमंत्री दोनों जब ब्राह्यण विरोधी मुखर जातिवादी तेंवर लिए हुए हैं तो गोरखपुर या फुलपूर के पंडित या आगे बनारस के पंडित क्योंकर नरेंद्र मोदी को सिर पर बैठाए रखेंगे?

सो गोरखपुर और फूलपुर का ट्रेंड आगे 2019 में बनारस में न बने यह तभी संभव है जब योगी आदित्यनाथ या तो हटें या अपनी सत्ता में ब्राह्यण की दमदार भागीदारी कराएं। अन्यथा वे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए गले की हड्डी बन गए हैं। ये उनसे देश में कितना ही प्रचार कराएं वे यूपी में भाजपा के बंटाधार की गारंटी है। दिक्कत यह भी है कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह ने स्थापित पुराने ब्राह्यणों की लीडरशीप खत्म कर दिनेश शर्मा या श्रीकांत शर्मा जैसे जो नए निराकार चेहरों को आगे बढ़ाया है उनका ब्राह्यणों में कोई मतलब नहीं है। कुल मिलाकर यूपी में योगी का ठाकुर राज जैसा है वैसा चलेगा और ब्राह्यण देखेगा कि सपा-बसपा-कांग्रेस में उसके लिए विकल्प है या नहीं? यदि एलायंस बना और साझा ब्राह्यण चेहरा बनारस में कोई आया तो बनारस का पंडित वही रूख लिए होगा जो गोरखपुर, फुलपूर के पंडितों का रहा।

क्या आप नहीं मानते? तो वक्त आने दीजिए और सपा-बसपा-कांग्रेस का एलायंस बनने दीजिए। हां, एलायंस न बने और योगी का राज ब्राह्यण राज हो जाए, तब तो फिर बात ही अलग है!

(साई फीचर्स)

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