उफ! मोदी राज में हिंदू का ऐसा बंटना

 

(हरि शंकर व्यास)

बतौर हिंदू मैं आज घायल हूं। कितना दुखद है यह जानना कि आज फारवर्ड जातियों का भारत बंद आह्वान है इसे लेकर मध्य प्रदेश सरकार सांसत में है। जिलों में धारा 144 लगी है। बंद भले सफल हो या न हो लेकिन यह भाव, यह धारणा तो बनेगी कि हिंदू समाज में फारवर्ड बनाम एससी-एसटी या आरक्षित बनाम अनारक्षित जातियों में पंगेबाजी सड़क पर उतरने के तेवर वाली हो गई है। मध्य प्रदेश जैसे शांत और जात राजनीति में अपेक्षाकृत कम उलझे राज्य के शहरों में पांच महीने पहले दलित बनाम फारवर्ड मुठभेड़ हुई तो आज फिर तनाव है। मुख्यमंत्री की जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान सीधी में जूता फेंका गया। ऊंची जाति के लोगों ने एससी-एसटी एक्ट पर भाजपा सांसद रीति पाठक का ऐसा घेराव किया, जो उन्होंने परेशान हो कर कहा- तलवार ला कर मेरा गला काट दो। मैं ही बिल के लिए वोट देने वाली नहीं थी।

सोचें, जातियां कितनी आज आंदोलित हैं? पांच महीने पहले दलितों ने एससी-एसटी एक्ट में सुधार पर जो किया वह प्रमाण था। मराठा, जाट व पटेल अपना गुस्सा पूरे भभके से बता चुके हैं। अभी दलित इस बात पर भी आंदोलित हैं कि मोदी सरकार की हिमाकत जो हिदायत दे रही है कि रेडियो-टीवी पर एससी बोला जाए न कि दलित! ब्राह्मणों की सुगबुगाहट का आलम यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर मोदी-शाह के तमाम आयोजनों के बावजूद सौ टका निष्ठावान स्वंयसेवक कलराज मिश्र ने यूपी की फीडबैक में यह हकीकत कल बयां कर दी कि ब्राह्मणों की चिंता करनी होगी और एससी-एसटी एक्ट के दुरूपयोग का मामला कम गंभीर नहीं है।

ध्यान रहे पहले से एससी-एसटी एक्ट अस्तित्व में है। मोदी सरकार से पहले भी इसमें दुरूपयोग की शिकायत थी। ऊची व दलित जातियों में ठनती भी थी लेकिन कब ऐसा हुआ कि दलित इसके लिए भारत बंद कराएं तो फारवर्ड भी भारत बंद का आह्वान करें?

हां, सोचें कि हिंदू समाज में जातियों का आज जैसा विद्वेष पहले कब बना? वीपी सिंह की मंडल घोषणा के समय भूंकप आया था लेकिन आ कर जल्द खत्म हुआ। मगर पिछले साढ़े चार सालों में जाति विद्वेष और व्यवहार घर-घर प्रसारित हो ऐसा पका है या पक रहा है, जिससे व्यवहार में स्थायी बदलाव आएगा। सवाल है कौन जिम्मेवार? क्या गुजरात की सरकार या हार्दिक पटेल? क्या देवेंद्र फड़नवीस और मराठा नेता या मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और वहा के दलित या फारवर्ड नेता?

नहीं। इनमें से कोई जिम्मेवार नहीं है। यदि कोई जिम्मेवार है तो वे सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हैं। इसलिए हैं क्योंकि ये आए थे हिंदुओं की सामूहिकता के सामूहिक हुंकारे में और सत्ता में आने के बाद उसको बीस साला बनाने, उसको बपौती बनाने के लिए जातिवाद की दस तरह की नौटंकियां की। कभी दलित के घर जा कर खाना खाने की नौटंकी थी। कभी दलित साधुओं का जमावड़ा बना कुंभ स्नान किया तो कभी पिछड़ों की राजनीति की तो कभी ब्राह्मणों को, कभी जाटों को, कभी राजपूत को पटाने के भोंड़े नुस्खे अपनाए। ताजा शर्मनाक नुस्खा पिछड़ों के लिए आयोग बना देने का हल्ला करके यह ऐलान है कि अगले तीन साल में मतलब 2021 तक पिछड़ी जातियों की जनगणना काम पूरा करा लिया जाएगा।

वोट पटाने का कितना बेहूदा मगर भयावह नुस्खा! यह हिंदुओं को जातियों के खांचों में और बांटने का वह धर्म विरोधी, समाज विरोधी काम है, जिसका डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने इस अखबार के अपने क़ॉलम में खुलासा किया और उसे सरकार का राष्ट्रविरोधी काम बताया। सोचें जो काम कांग्रेसी सरकारों ने नहीं किया। अंग्रेजों ने भी महात्मा गांधी के विरोध के कारण बंद कर दिया। मनमोहन सरकार को जो काम जनदबाव में, हिंदू दबाव में बंद करना पड़ा उसी जात जनगणना का काम मोदी सरकार करा रही है लेकिन संघ परिवार और भाजपा में यह बेसिक समझ और चिंता भी नहीं है कि यह हिंदू धर्म व समाज दोनों में टूटन लाने वाला जघन्य अपराध है। इससे अंततः संघ, भाजपा, हिंदू राजनीति और नरेंद्र मोदी व अमित शाह खुद बरबाद होंगे।

बहरहाल, मैं भटक गया हूं। बुनियादी बात फारवर्ड जातियों, ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य में, एससी-एसटी एक्ट, आरक्षण के खिलाफ भारत बंद का आइडिया आ जाना है तो उधर दलित और पिछड़ों में भी अपनी-अपनी जिद्द में उग्र छोर पकड़ना है। हिंदू इसमें बुरी तरह बंट और बिखर रहा है।

अपने को दलित-आदिवासी गुस्सा फिलहाल नंबर एक पर दिखलाई दे रहा है। गौरक्षकों की आक्रामकता, ऊना की घटना, रोहित वेमुला, भीम सेना और उसके चंद्रशेखर के साथ व्यवहार, भीमा कोरेगांव, एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, उसमें पहले सरकार की दुविधा, फिर ताब़ड़तोड़ सरेंडर व अब दलित नहीं एससी कहो जैसे एक के बाद एक घटनाक्रम ने पूरे देश के दलितों में जातीय अतिवाद बना डाला है। यह 2019 में भाजपा के खिलाफ सियासी बदले की भावना में बदला लेगा। यदि 2014 में संघ-भाजपा, मोदी-शाह और इनकी हिंदू राजनीति के प्रति 40-50 प्रतिशत दलितों का भरोसा बना था तो वह आज 10-20 प्रतिशत भी मुश्किल से बचा हुआ होगा। भाजपा के सहयोगी और इधर-उधर से आए दलित एमपी-एमएलए भी इंतजार में होंगे कि कब चुनाव आए और ऐन वक्त लात मारें। और ध्यान रहे जितना एससी का मोहभंग है उससे अधिक आदिवासी का है।

वैसे किसी पार्टी के प्रति वर्ग या वर्ण का मोहभंग यों सामान्य बात मानी जानी चाहिए। इसमें हर्ज नहीं है लेकिन मोदी-शाह के राज की मूर्खताओं ने आरक्षण, राजकीय व्यवहार के मामले में जातियों में परस्पर खुन्नस के जो बीज डाले हैं वे हिंदू समाज को आगे कई तरह से बिखरेंगें। अपने आपमें यह अकल्पनीय बात है जो एक एससी-एसटी एक्ट (जो कई दशक से अस्तित्व में था।) पर फारवर्ड और दलित भारत बंद करने लगे और हिंसा भी हो।

इस हकीकत पर जरा इस सवाल के साथ भी सोचें कि पिछले साढ़े चार सालों में बतौर समाज हिंदुओं ने सबसे ज्यादा क्या सुना? अपना मानना है कि साढ़े चार साल समाज ने आरक्षण की मांग, दलितों पर अत्याचार व उनका गुस्सा तो फारवर्ड और पिछड़ों की मांगों व जातियों के नए-नए तेवर ही अधिक देखे हैं! और अब तो बहुत ही विकट दौर बनता नजर आ रहा है। क्या नहीं?

(साई फीचर्स)

 

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